गणेश जी का जन्म कैसे हुआ-उनका नाम गणेश कैसे पड़ा

आज हम विस्तार में जानेंगे की विघ्नहर्ता गणेश जी का जन्म कैसे हुआ और उनका नाम गणेश कैसे पड़ा.

श्री गणेशाय नमः

श्री गणेश जी शुभता के प्रतीक है इसलिए संसार में सभी शुभ कार्य से पूर्व गणेश जी की पूजा अर्चना की जाती है।पर क्या आप जानते है ? गणेश जी को शुभता का प्रतीक क्यों कहा जाता है और उनका नाम श्री गणेश कैसे रखा गया।

गणेश जी का जन्म कैसे हुआ-उनका नाम गणेश कैसे पड़ा

गणेश जी का जन्म कैसे हुआ-उनका नाम गणेश कैसे पड़ा

यह कथा है श्री गणेश जी के जन्म की। जब कार्तिक को दक्षिण की ओर राक्षस से युद्ध करने के लिए कैलाश छोड़ कर जाना पड़ा था और दूसरी ओर भगवान शिव जी भी साधना के लिए कैलाश छोड़ कर चले गए थे।

देवी पार्वती बहुत दुखी थी कि उनके पुत्र और उनके पति दोनों उनसे दूर चले गए। अब कैलाश पर देवी पार्वती अकेली रहती थी और इसी चिंता में उन्होंने सोचा की “अब मैं एक ऐसे पुत्र को जन्म दूंगी जो हमेशा मेरे साथ रहेगा, मुझे छोड़ कर कभी कहीं ना जाएगा। और संसार के सभी दुख दूर करेगा।

गणेश जी का जन्म

एक दिन देवी पार्वती हल्दी का उबटन लगा रही थी। उस उबटन के मैल से उन्होंने एक मूर्ति बनाई और उस मूर्ति को देखकर माता पार्वती की आंखों में आंनद के आंसू आ गए। माता पार्वती की आंसू की एक बूंद उस बालक की मूर्ति पर जा गिरी और उस मूर्ति में प्राण आ गए। देवी पार्वती को विश्वास नहीं हुआ कि उनका स्वपन पूर्ण हो गया। माता पार्वती ने उस मूर्ति में अपने बालक की रचना और कामना की इसीलिए उस मूर्ति में प्राण आ गए थे।

उस बालक ने माता पार्वती को “मां” कहा। उस बालक ने माता पार्वती से कहा कि मां मेरा नाम क्या होगा। माता पार्वती ने कहा “जो विनय से परीपूर्ण हो और जिसके गुणों में विनय ही नायक हो” इसलिए मेरे पुत्र का नाम “विनायक” होगा। ऐसे विनायक जी का जन्म हुआ।

महादेव देवी पार्वती को अनुभव कराना चाहते थे कि जब माता को इच्छा शक्ति प्रबल हो तो अजीव को भी जीव बना सकती है।

विनायक से गणेश जी कैसे बने

एक दिन जब देवी पार्वती जी को पता चला कि महादेव शिव जी की साधना पूरी हुई और वह कैलाश लौट रहे है। तब माता पार्वती ने कैलाश को सज करने का आदेश दिया और सभी गणप्रेत महादेव शिव जी के स्वागत में लग गए। स्वागत के प्रबंध के विषय में पूछने के लिए कोई ना कोई गण माता के कक्ष में बिना अनुमति के प्रवेश कर रहे थे और जब माता स्नानघर की ओर जाने लगी तभी वहां नंदी आ पहुंचा। यह देखकर उन्हें बहुत गुस्सा आया कि कोई भी उनके कक्ष में बिना अनुमति प्रवेश कर रहा है।

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उन्होंने विनायक को बुलाया और कहा “पुत्र मुझे वचन दो की तुम हमेशा मेरी आज्ञा का पालन करोगे” विनायक ने माता को वचन दिया कि वह हमेशा आज्ञा का पालन करेगा। उन्होंने कहा “पुत्र, मैं स्नान करने जा रही हूं तुम ध्यान रखना कि घर के अंदर कोई प्रवेश ना कर पाए”। विनायक (गणेश) जी ने माता पार्वती को वचन दिया कि वह अन्दर किसी को प्रवेश करने नहीं देंगे।

माता पार्वती के आदेश और अपने वचन को पूरा करने के लिए भगवान विनायक (गणेश जी) द्वार पर जा कर खड़े हो गए। कुछ समय पश्चात वहां भगवान महादेव आए गए और वह जैसे ही अंदर जाने लगे तभी भगवान गणेश ने उनको रोक लिया।

गणेश नाम कैसे पड़ा

शिव जी ने गणेश को विनायक कह के पुकारा, तब Ganesh जी ने महादेव से पूछा कि आप मेरा नाम कैसे जानते है ? मैं आप से कभी मिला नहीं, आप कौन है ? इस पर शिव जी ने कहा – तुम्हारी माता ने मेरे बारे में बताया होगा। गणेश जी ने पहचान लिया कि वह मेरे पिता है.

शिव जी ने कहा ” चलो तुम्हारी माता के पास चलते है” गणेश जी ने रोक कर मना किया और कहा कि आप भीतर नहीं जा सकते। आपको प्रतीक्षा करनी होगी। मां बाहर आकर आप से मिलेगी। गणेश जी ने कहा “मैं अपनी माता के आदेश का पालन कर रहा हूं” मेरी माता ने किसी को भी भीतर जाने से मना किया है महादेव जी ने कहा कि “मेरे भीतर जाने से तुम्हारी माता के आदेश का निरादर नहीं होगा विनायक”, “मैं और पार्वती एक ही है”, “तुम मुझे मेरे ही घर में प्रवेश करने से रोक रहे हो”। महादेव जी के बहुत समझाने पर भी गणेश भगवान नहीं माने।

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जब यह बात महादेव के गण प्रेत और सभी देवी देवताओं को पता चली तो वह सब भी गणेश जी को समझाने आ गए। परन्तु वह किसी की भी बात नहीं सुन रहे थे और सभी से युद्ध करने के लिए सज हो गए। तभी महादेव शिव जी को गुस्सा आ गया और उन्होंने अपने त्रिशूल से गणेश जी का सिर धड़ से अलग कर दिया।

उसी समय माता पार्वती स्नान करके बाहर आई और अपने पुत्र गणेश का कटा सिर जमीन पर देखकर माता पार्वती गुस्सा हो गईं और उन्होंने सभी देवी देवताओं पर क्रोध किया। महादेव व सभी देवों ने माता के क्रोध को शांत करने की कोशिश की परन्तु माता का गुस्सा शांत नहीं हुआ। माता ने कहा- “यदि आप सब चाहते है मै शांत हो जाऊ तो मेरे पुत्र को पुन: जीवित कीजिए”।

महादेव शिव जी ने कहा “विनायक के भस्म शीर्ष का पुन: आगमन असंभव है” यह सुन कर माता अपने रौद्र रूप में आ गई। माता ने कहा “इस सृष्टि में मेरा पुत्र लौट कर नहीं आ सकता तो इस सृष्टि की ही आवश्यकता नहीं मैं इस सृष्टि को ही नष्ट कर दूंगी।”

गजराज (गजासुर) का सिर

सृष्टि को बचाने और माता पार्वती का गुस्सा शांत करने के लिए भगवान शिव ने देवराज इन्द्र और नंदी को धरती पर भेजा और कहा “विनायक के धड़ पर किसी जीव का शीर्ष लगाना होगा जो जीव सबसे पहले दिखाई दे उस जीव का शीर्ष लाना होगा परन्तु जीव अपनी इच्छा से शीर्ष दान करे।

देवराज इन्द्र और नंदी को सबसे पहले गजराज (हाथी) दिखाई देते है वह दोनों गजासुर से शीर्षदान करने की विनती करते है। गजराज गजासुर मान जाते है और अपनी इच्छा से शीर्ष अर्पित करते है।  महादेव भगवान शिव जी ने हाथी का सिर विनायक गणेश जी धड़ से जोड़ कर उन्हें पुन: जीवित किया। साथ ही यह आशीर्वाद दिया विनायक विघ्नहरण और ज्ञान अरजण दोनों का उचित संतुलन करेगा।

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ऐसे ही सभी देवों ने विनायक को आशीष व शक्तियां प्रदान की और आशीर्वाद दिया वह शांति और समृद्धि के वाहक होंगे तथा हर गुण से रहित होने के कारण संसार में विनायक को शुभता का प्रतीक माना जाएगा। माता पार्वती ने भगवान श्री गणेश जी को सभी गणों का इष्ट घोषित किया और कहा कि “अब से गौरी नंदन विनायक संसार में गणपति व गणेश के नाम से प्रसिद्ध होगा और शुभता के प्रतीक है इसलिए संसार में सभी कार्य से पूर्व गणेश जी की पूजा की जाएगी।

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