Maa Durga के नौ रूपों की कहानी – Navratri

इस नवरात्री के पावन अवसर पर हम आपको Maa Durga के नौ रूपों की कहानी – Navratri के बारे में बताएँगे.

यह कहानी है देवी आदि शक्ति से माता पार्वती और उनके नव दुर्गा स्वरूप की. यह कथा  केवल एक ही कन्या की है, जिन्होंने अलग-2 अवतार लिए और इन्ही अवतारों में नव दुर्गा का अवतार आता है.

Maa Durga के नौ रूपों की कहानी - Navratri

जैसा की नव दुर्गा माता पार्वती के ही अलग-2 स्वरुप हैं. इसलिए सबसे पहले हम जान लेते हैं की माँ पार्वती का जन्म कैसे हुआ था.

Maa Durga के नौ रूपों की कहानी – Navratri

माता पार्वती का जन्म

शिव से मिलने के लिए आदि शक्ति ने 108 जन्म लिए। सती के बाद आदि शक्ति ने पर्वतराज हिमवान और मैनावती की पुत्री पार्वती के रूप में जन्म लिया। शैलराज हिमालय ने अपनी पुत्री पार्वती का विवाह शिव से कर दिया। पार्वती ब्रह्मांड का प्रतीक हैं और शिव शून्य का। दोनों एक दूसरे से मिल कर पूर्ण होते हैं.

पार्वती के जन्म से पहले आदि शक्ति ने सती के रूप में जन्म लिया था।

सती का जन्म

दक्ष ब्रह्माजी के मानस पुत्र थे। दक्ष का विवाह मनु की कन्या प्रसूति के साथ हुआ था। दक्ष के प्रजापति बनने के बाद ब्रह्माजी ने दक्ष को बुलाया और कहा कि “एक समय की बात है जब ब्रह्मांणकी रचना नहीं हुई थी तब चारों ओर अंधकार था। उस समय केवल भगवान शिव ही थे और सृष्टि की रचना के लिए उन्होंने प्रकृति को अपने से अलग कर दिया। जब आदि शक्ति शिव के शरीर से अलग हुई तो वह शिवत्व ज्ञान भूल गई थी।

ब्रह्माजी ने दक्ष से कहा कि तुम शिव और शक्ति के पुन: मिलन का माध्यम बनो। जगत के कल्याण में निमित बनो। उस समय शिव और शक्ति दोनों अलग थे। इसीलिये ब्रह्माजी ने दक्ष से कहा कि वे आदिशक्ति की तपस्या करे उनसे पृथ्वी पर अवतरित होने का निवेदन करें। दक्ष ने ब्रह्माजी से कहा “मैं आदिशक्ति से अपनी पुत्री के रूप में जन्म लेने के लिए निवेदन करूंगा और समय आने पर उनका विवाह महादेव से करा दूंगा“।

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महादेव को सांसारिक बंधन से बांधने के लिए आदिशक्ति का जन्म लेना अनिवार्य था। दक्ष ने कई वर्षों तक तपस्या की। एक दिन आदिशक्ति ने दक्ष को दर्शन दिए और कहा कि तुम्हारी तपस्या सफल हुई मैं तुम्हारे तप से प्रसन्न हुई।  दक्ष ने आदिशक्ति से कहा “मैं आपसे विनती करता हूं कि आप मेरी पुत्री के रूप में जन्म लेकर मुझे धन्य करे और मैं वचन देता हूं कि सही समय आने पर मैं आपका विवाह महादेव से करा दूंगा। आप धरती पर पुनःअवतरित होकर महादेव से मिलन करे ताकि वह सांसारिक कार्य में पुनः जुड़ सकें”।

देवी आदिशक्ति ने दक्ष को वरदान दिया और कहा “मैं तुम्हारी पुत्री के रूप में जन्म लूंगी पर यदि तुमने मेरा अनादर व अपमान किया तो मैं उसी समय तुम्हारा परित्याग कर दूंगी” इस प्रकार देवी आदिशक्ति ने सती के रूप में जन्म लिया।

शिव – सती विवाह

सती के जन्म के बाद। एक दिन ब्रह्माजी अहंकार में आकर अपने तीन सिरों से वेदों का पाठ कर रहे थे और दो सिर से वेदों को गालियां दे रहे थे। प्रारंभ में ब्रह्माजी के पाँच सिर थे। यह सुनकर शिवजी क्रोधित हो गए और ब्रह्माजी का एक सिर काट दिया। ब्रह्माजी दक्ष के पिता थे।

अपने पिता का कटा सिर देखकर दक्ष शिव पर क्रोधित हो गए और कहा अब मैं अपने पिता के अपमान का प्रतिशोध लूंगा। दक्ष ने क्रोध में आकर प्रण लिया कि “महादेव की पूजा-अर्चना नहीं करेंगे और सती को भी शिव से दूर रखेंगे” दक्ष ने शिव का नाम लेने से भी माना कर दिया था। सती को महल के बाहर जाने की अनुमति भी नहीं थी। उन्होंने विवाह-योग्य होने तक सती को शिव से दूर रखा। परंतु सती को शिव के होने का एहसास होने लगा और वह शिव से प्रेम करने लगी।

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जब यह बात दक्ष को पता चली तो उन्होंने सती के स्वयंवर का आयोजन कर दिया पर उसमें शिवजी को नहीं बुलाया। शिव का अपमान करने के लिए उनकी पत्थर मूर्ति को स्वयंवर में रख दिया और सती से आए हुए राजकुमारों में से अपना वर चुनने को कहा परंतु सती ने कहा जिससे वह प्रेम करती हैं वरमाला उसके गले में ही जाएगी और वरमाला शिवजी की मूर्ति के गले में चली गई।

भगवान् शिव प्रकट हुए और वरमाला ग्रहण करके सती को अपनी पत्नी के रूप में स्वीकार कर लिया।अपने पिता की इच्छा के विरुद्ध होकर सती ने शिव को पति के रूप में चुनने के कारण दक्ष बहुत क्रोधित हुए। उन्होंने कहा मैं इस विवाह को मान्यता नहीं दे सकता। प्रजापति दक्ष ने सती और शिव के विवाह को स्वीकार नहीं किया। ब्रह्माजी के बहुत समझाने पर भी प्रजापति दक्ष नहीं माने तभी वहां पर भगवान विष्णु प्रकट हुए और उन्होंने प्रजापति दक्ष से कहा “शिव से आदि शक्ति का मिलन संसार के लिए आवश्यक है।”

भगवान विष्णु के समझाने पर प्रजापति दक्ष ने सती और शिव की विवाह को स्वीकृति तो दे दी पर वह शिव को अपना जामाता नहीं मानते थे। विवाह पश्चात सती अपने पिता का घर छोड़कर शिव के साथ कैलाश चली गई। दक्ष शिव को शत्रु मानते थे और अपने शत्रु से विवाह करने पर वह अपनी पुत्री से संबंध नहीं रखना चाहते थे।

सती का आत्मदाह

एक दिन प्रजापति दक्ष ने भव्य यज्ञ का आयोजन किया। जिसमें उन्होंने अपने जामाता शिव और पुत्री सती को यज्ञ में आने का निमंत्रण नहीं दिया। जब सती ने देखा कि सभी देव उनके पिताजी के यज्ञ में जा रहे है तब उन्होंने  शिव से यज्ञ में जाने के लिए कहा। शिवजी ने कहा कि सारे देवताओं को निमंत्रित किया गया है, उन्हें नहीं। ऐसे में किसी के घर बिना निमंत्रण के जाना अशुभ होता है। देवी सती नहीं मानी उन्होंने कहा “वह मेरे पिता का घर है और एक पुत्री को पिता के घर जाने के लिए निमंत्रण कि आवश्यकता नहीं होती

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शिव जी के बहुत समझाने पर भी देवी सती नहीं मानी। वह अपनी बात पर जोर देती रही कि उनको यज्ञ में जाना ही है, और शिव जी से कहा यदि आपको मेरे साथ नहीं आना तो मैं अकेली ही चली जाऊंगी। आप मुझे जाने की अनुमति दे दीजिए। शिव जी ने अकेले जाने से मना किया। तब सती ने महादेव को अपनी कसम देकर कहा कि आप मुझे रोकेंगे नहीं, ना ही मेरे पास आंएगे, यदि वहां जाने से मेरा अहित होता है तो अहित होने के बाद ही आप वहां आयंगे।

शिव जी को अपनी सौगंध में बांध कर वह यज्ञ में चली गई। जब देवी सती वहां पहुंची तो द्वारपाल ने सती को द्वार पर ही रोक दिया और कहा आपको और महादेव को यज्ञस्थल पर जाने की अनुमति नहीं है। पर देवी सती को अब भी यही लग रहा था कि मेरे पिता मेरे पति का अपमान नहीं सकते। और अपने पिता को मानने के लिए यज्ञस्थल पर चली गई। दक्ष ने सती को देखकर उसकी घोर निंदा की व उनके पति महादेव के लिए अपमानजनक वचन भी कहे। इससे सती अपने पति महादेव का अपमान न सह सकीं। अपनी देह को नष्ट करने का निर्णय ले लिया। उन्होंने अपने पिता से कहा की इस देह के नष्ट होने के बाद वह पुन: जन्म लेगी।

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देवी सती ने आदि शक्ति रूप लिया और योगाग्नि से स्वयं को भस्म कर दिया।

सती की मृत्यु का समाचार पाकर भगवान् शिव ने अपने अंश वीरभद्र को उत्पन्न करके उसे प्रजापति दक्ष का सिर काटने का आदेश दिया। वीरभद्र ने दक्ष प्रजापति की रक्षा करने वाले सभी लोगो को मारकर अंत में दक्ष का सिर भी काट दिया। बाद में शिवजी वहां आए और सती के मृत देह को लेकर जाने लगे तब दक्ष कि पत्नी और ब्रह्माजी के प्रार्थना करने पर भगवान् शिव ने दक्ष प्रजापति क्षमा कर उसके सिर के बदले में बकरे का सिर लगा कर उसे जीवनदान दिया।

महादेव देवी सती के मृत देह को अपने हाथो में लेकर कई वर्षों तक ब्रह्मांड में भटकते रहे। तब आदि शक्ति ने भगवान विष्णु से कहा कि वह अपने सुदर्शन चक्र से मेरे मृत देह को मुक्त करे तभी वह नया जन्म ले पाएगी और महादेव से मिलन का मार्ग सज होगा। भगवान विष्णु के सुदर्शन चक्र से सती के शरीर के 52 टुकड़े हुए  वह धरती पर जहां गिरे वही शक्ति पीठ बन गए।

maa durga ke 9 roop name in hindi

नवदुर्गा के 9 रूप

सभी असुर नारी को कमजोर मानते थे उनको लगता था कि नारी असुर का अंत नहीं कर सकती थी। वो किसी से युद्ध नहीं कर सकती। इसलिए ब्रह्माजी या शिव से वरदान मांगते समय असुर नारी का नाम नहीं लेते थे। अपने आपको अमर मानकर आतंक करते गए। धरती पर मनुष्य के साथ साथ देवी देवताओं को भी मारने लगे थे.

असुरों के बढ़ते हुए आतंक को रोकने के लिए माता पार्वती ने दुर्गा रूप धारण कर सभी दुष्ट असुरों का अन्त किया।

नवरात्रि में माता दुर्गा के नौ रूपों को पूजा की जाती है। दुर्गा के इन सभी नौ रूपों का अपना अलग-2 महत्व है।

maa durga ke 9 roop ka naam

  1. शैलपुत्री (Shailputri)
  2. ब्रह्मचारिणी (Brahmacharini)
  3. चंद्रघंटा (Chandraghanta)
  4. कूष्माण्डा (kushmanda)
  5. स्कंदमाता (Skandmata)
  6. कात्यायनी (katyayani)
  7. कालरात्रि (kalratri)
  8. महागौरी (mahagauri)
  9. सिद्धिदात्री (Siddhidatri)

Maa Durga के नौ रूपों का वर्णन

1. शैलपुत्री

शैलपुत्री नवदुर्गा का पहला रूप है। शैलराज की पुत्री के रूप में जन्म लेने से उनका नाम शैलपुत्री रखा गया। इनका वाहन वृष है। माता के एक हाथ में त्रिशूल और दूसरे हाथ में पुष्प कमल धारण किया है। इनको करुणा और ममता की देवी माना जाता है।

2. ब्रह्मचारिणी

ब्रह्मचारिणी नवदुर्गा का दूसरा रूप है। इसका अर्थ है, ब्रह्म पथ पर चलना। ब्रह्माजी का दूसरा नाम है तप। तप मतबल त्याग, समर्पण, और संपूर्ण श्रद्धा।  माता पार्वती ने भगवान शिव को पति के रूप में पाने के लिए कई वर्षों तक कठोर तपस्या की थी। इसलिए उनका नाम ब्रह्मश्चारिणी पड़ा।

3. चंद्रघंटा

चंद्रघंटा नवदुर्गा का तीसरा रूप है। माता के मस्तक में घण्टे के आकार का अर्धचन्द्र है। इसी कारण माता का नाम चंद्रघण्टा पड़ा। महादेव ने पार्वती से विवाह करने के लिए संसार का सबसे सुंदर रूप धारण किया। शिव चंद्रेश और पार्वती चंद्रघंटा। इसी रूप में ही दोनों का विवाह हुआ था। माता का वाहन सिंह है। इनकी पूजा करने से भक्तों के कष्ट दूर होते है।

4. कूष्माण्डा

कूष्माण्डा नवदुर्गा का चौथा रूप है। पार्वती शक्ति का स्वरूप है, और सूर्य के तेज का स्त्रोत भी। ऊर्जा का छोटा सा बीज जिसने सारे ब्रह्मांड की रचना की। कूष्माण्डा देवी ने सारे ब्रह्मांड को जीवन दिया। माता की पूजा से भक्तों के रोग-शोक मिट जाते हैं। और, यश, बल तथा आरोग्य की वृद्धि होती है।

5. स्कंदमाता

स्कंदमाता नवदुर्गा का पांचवा रूप है। ‘कुमार कार्तिकेय’ स्कंद के नाम से भी जाने जाते हैं। कार्तिकेय की माता होने के कारण पार्वती के इस स्वरूप को स्कंदमाता के नाम से जाना जाता है। मां को मोक्ष का द्वार खोलने वाली माता के रूप में भी पूजा जाता है। यह भक्तों की समस्त इच्छाओं की पूर्ति करती हैं।

6. कात्यायनी

कात्यायनी नवदुर्गा का छठा रूप है। संसार की जननी और रक्षक मां को कात्यायनी, जगदम्बा, और दुर्गा के नाम से जाना जाता है। पार्वती ने कात्यायनी मां अंबे का रूप धारण करके महिषासुर राक्षस का वध किया इसलिए उन्हें महिषासुर मर्दिनी के नाम भी जाना जाता है। मनचाहे वर की प्राप्ति के लिए कात्यायिनी माता की ही पूजा करती हैं।

7. कालरात्रि

कालरात्रि नवदुर्गा का सातवां रूप है। शुंभ निशुंभ नाम के दो असुरो का वध करने के लिए पार्वती ने मां कालरात्रि रूप धारण किया। इनकी पूजा करने से काल और असुरों का नाश होता है। इसी वजह से मां के इस रूप को कालरात्रि कहा जाता है। यह माता हमेशा शुभ फल ही देती हैं।

8. महागौरी

महागौरी नवदुर्गा का आठवां रूप है। भगवान शिव को पति रूप में पाने के लिए पार्वती ने कई वर्षों तक कठोर तपस्या की थी, जिससे उनका शरीर काला पड़ गया था। पार्वती की तपस्या से प्रसन्न होकर शिव ने इन्हें स्वीकार कर लिया, पर जब शिव जी उनके शरीर को गंगा-जल से धोया तब उनका रूप गौर वर्ण का हो गया था तभी से इनका नाम गौरी पड़ा। और महादेव से विवाह पश्चात वह गौरी से महागौरी बनी। इस दिन लोग अष्टमी पूजन करते है। महिलाएं अपने सुहाग के लिए देवी मां को चुनरी भेंट करती हैं। महागौरी  शिवजी की अर्धांगिनी हैं। साथ ही भक्तों के सभी कष्ट दूर करती है।

9. सिद्धिदात्री

सिद्धिदात्री नवदुर्गा का नौवां रूप है। नवरात्रि के अंतिम दिन को नवमी के नाम से मां कि पूजा अर्चना होती है। लोग छोटी कन्याओं का पूजन करते है। माता की कृपा से मनुष्य सभी प्रकार की सिद्धियां प्राप्त कर मोक्ष पाने मे सफल होता है। मां सिद्धिदात्री की पूजा करने से रूके हुए सभी काम पूरे होते हैं और सभी काम में सिद्धि मिलती है।

तो ये थी माँ दुर्गा के नौ रूपों की कहानी – Navratri जिनका पूजन हम नवरात्रों के नौ दिनों तक करते हैं.

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